अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना
Akhil Bharatiya Itihas Sankalan Yojna

हिंदू-कालगणना का वैज्ञानिक एवं वैश्विक स्वरूप


कोई भी इतिहास बिना कालक्रम के नहीं लिखा जा सकता। वर्तमान समय में जो भी इतिहास लिखा जा रहा है, वह ईसाई-कालगणना के आधार पर लिखा जा रहा है जिसका न तो कोई वैज्ञानिक-आधार है और न ही कोई प्राचीन कालक्रम। ईसाई-कालगणना विश्वोत्पत्ति 23 अक्टूबर, 4004 ई॰पू॰ को मानती है जो नितान्त अवैज्ञानिक है। सन् 1654 ई॰ में प्रतिपादित इस तिथि ने संसार की सभी प्राचीन सभ्यताओं (मिस्र, बेबीलोनिया, सिंधुघाटी आदि) के तिथ्यांकन पर भरपूर प्रभाव डाला।

इन सभ्यताओं की तिथि 4004 ई॰पू॰ से अधिक न होने पाए, इसका भरपूर प्रयास यूरोपीय-पुरातत्ववेत्ताओं ने किया। यहाँ तक कि मानव 10 हज़ार वर्ष पूर्व ही सुसंस्कृत हो सका, यह मान्यता अभी भी पुरातत्ववेत्ताओं एवं इतिहासविदों में बद्धमूल है।
दूसरी ओर हिंदू-कालगणना ही ऐसी एकमात्र गणना-पद्धति है जो खगोलीय आधार पर कालगणना करती है। इस कालगणना के अनुसार ब्रह्मा द्वारा सृष्टि-निर्माण को 1,97,29,49,115 वर्ष हो चुके हैं और वर्तमान में ब्रह्मा के 51वें वर्ष के प्रथम कल्प (श्वेतवाराह) के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के 28वें कलियुग का 5,115वाँ चल रहा है। अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना का लक्ष्य है सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर वर्तमान समय तक अपने देश भारत के इतिहास का पुनर्संकलन। इसके लिए योजना ने प्रथम चरण में कलियुग की तिथि को मानक बनाया है तथा कलियुग संवत् (‘कलियुगाब्द’) का प्रचलन प्रारम्भ किया है। इसी के साथ B.C. (Before Christ) एवं A.D. (Anno Domini) की जगह BCE (Before Common Era) एवं CE (Common Era) का प्रयोग भी प्रारम्भ किया गया है। अनेक विद्वानों ने इतिहास-लेखन में इसका प्रयोग प्रारम्भ किया है।
हिंदू-कालगणना को सम्पूर्ण देश में अंगीकृत कराने के उद्देश्य से योजना ने दो वर्ष सम्पूर्ण देश में कालगणना विषय लेकर इतिहास-दिवसों का आयोजन किया, संगोष्ठियाँ आयोजित कीं तथा अनेक प्रकाशन किए जिनमें श्री वासुदेव पोद्दार की कालजयी रचना ‘विश्व की कालयात्रा : कालपुरुष-इतिहास पुरुष’विद्वानों के बीच विशेष रूप से चर्चित रही है। श्री पोद्दार जी ने ‘द ब्रीफ हिस्ट्री आफ़ टाइम’लिखनेवाले यूरोपीय-लेखक स्टीफन हाकिंग के तर्कों, प्रमाणों तथा व्याख्याओं को अस्वीकारकर विश्व, ब्रह्माण्ड, काल तथा गति की वैज्ञानिक-व्याख्याएँ कीं। योजना की विशिष्ट उपलब्धि रही है कि उसने डा॰ दामोदर झा-जैसे वैदिक विद्वानों को इस कार्य में लगाया तथा कालगणना पर अनेक उपयोगी सन्दर्भ-ग्रन्थ प्रकाशित किए हैं। इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण देश में हिंदू-कालगणना के विषय में जानकारी का वातावरण बना है और इसका प्रचलन भी प्रारम्भ हुआ है। अभी भी योजना इस दिशा में प्रयासरत है।

 

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