अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना
Akhil Bharatiya Itihas Sankalan Yojna

भगवान् बुद्ध की तिथि 1887-1807 ई॰पू॰


अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना के प्रकल्पों में भगवान् बुद्ध की तिथि का निर्धारण भी सम्मिलित है। भगवान् बुद्ध के काल के संबंध में 60 से अधिक तिथियाँ हैं जो 270 ई॰पू॰ से 2422 ई॰पू॰ तक फैली हुई हैं। इनमें से अधिकांश तिथियाँ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित हैं। और किसी भी मान्यता पर पाश्चात्य विद्वान् एकमत नहीं हैं। तथापि, बुद्ध के निर्वाण की दो भिन्न तिथियों- 544 ई॰पू॰ और 483 ई॰पू॰ की घोषणा कर दी गई है और प्राचीन परम्परावाले बौद्ध-देश भी इन्हीं तिथियों को मानने के लिए बाध्य हो गए हैं। इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भी यही तिथियाँ पढ़ाई जा रही हैं और इसी आधार पर अन्य तिथियों की भी संयोजना की जा रही है।

भारतीय-इतिहास-परिशोध की दृष्टि से यह एक अत्यन्त भयंकर भूल है, क्योंकि भारतीय-स्रोतों में यह सिद्ध करने के लिए अत्यन्त प्रबल प्रमाण हैं कि भगवान् बुद्ध का जन्म 1887 ई॰पू॰ में और निर्वाण 1807 ई॰पू॰ में हुआ था। इसका अर्थ यह है कि भगवान् बुद्ध के मान्य काल में 1,300 वर्षों से अधिक की भूल है।
भगवान् बुद्ध को 1887-1807 ई॰पू॰ में मानने का सर्वप्रथम आधार पुराणों में प्राप्त राजवंशावलियाँ हैं। भगवान् बुद्ध कोसल के इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुए थे, जिसका श्रीराम के स्वर्गारोहण के पश्चात् कई भागों में विभाजन हुआ। फलस्वरूप श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के पुत्रों- अंगद और चन्द्रकेतु को वर्तमान नेपाल का भू-भाग प्राप्त हुआ था। नेपाल पर शासन करनेवाले लक्ष्मण के पुत्रों का वंश 'लिच्छवि' कहलाया। भगवान् बुद्ध का जन्म इसी लिच्छवि शाखा में हुआ था। कुशस्थली को राजधानी बनाकर राज्य करनेवाला कुशवंश (मूल इक्ष्वाकु-वंश) का 112वाँ राजा बृहद्बल महाभारत-युद्ध (3039-'38 ई॰पू॰) में अभिमन्यु के हाथों मारा गया था। युद्ध के पश्चात् बृहद्बल के पुत्र बृहत्क्षत्र कुशस्थली के राजा बने। बृहत्क्षत्र की वंश-परम्परा में 30 राजा हुए, जिन्होंने 1,504 वर्षों तक राज्य किया। 23वें वंशज शाक्य हुए, जो कपिलवस्तु को राजधानी बनाकर नेपाल के सान्निध्य में हिमालय की तराई के उत्तरी-पश्चिमी भाग के राजा बने। 24वें वंशज शुद्धोधन एवं 25वें गौतम बुद्ध थे। 31वें एवं अन्तिम वंशज (30वें राजा) सुमित्र के साथ इक्ष्वाकु-वंश का अन्त हो गया । यह वंश-परम्परा ब्रह्माण्डमहापुराण (उपोद्घात, अध्याय 4), भागवतमहापुराण (स्कन्ध 9, अध्याय 12) एवं विष्णुमहापुराण (अंश 4, अध्याय 22) में दी हुई है । इस प्रकार (3139-'38-1504=) 1634 ई॰पू॰ में सुमित्र पर यह वंश-परम्परा समाप्त हो चुकी थी और 24वें वंशज गौतम बुद्ध का काल 1634 ई॰पू॰ से पूर्व प्रमाणित होता है। प्रायः सभी इतिहासकार एकमत हैं कि गौतम बुद्ध मगध-नरेश बिम्बिसार एवं अजातशत्रु के समकालीन थे और अजातशत्रु के शासनकाल में ही बुद्ध का निर्वाण हुआ था। हम मगध के राजवंशों की कालगणना करते आ रहे हैं। 1994 ई॰पू॰ से प्रारम्भ शिशुनाग-वंश के 5वें राजा बिम्बिसार ने 38 वर्ष (1852-1814 ई॰पू॰) एवं छठे राजा अजातशत्रु ने 27 वर्ष (1814-1787 ई॰पू॰) शासन किया था । श्रीलंका से प्राप्त बौद्ध-ग्रन्थ 'महावंश' के अनुसार अजातशत्रु के राज्यारोहण के 8वें वर्ष बुद्ध का निर्वाण हुआ था। अतः 1807 ई॰पू॰ बुद्ध का निर्वाण-काल आता है ।
बुद्ध को 19वीं शती ई॰पू॰ में मानने का दूसरा आधार इस अवधारणा में है कि सर विलियम ज़ोन्स के वक्तव्य को आधार बनाकर डा॰ राधाकुमुद मुखर्जी-जैसे अनेक प्रमुख इतिहासकारों ने सिकन्दर के भारत पर आक्रमण की यूनानी-तिथि को 'भारतीय-इतिहास का मूलाधार' मान लिया है। फलस्वरूप सिकन्दर के समकालीन 'चन्द्रगुप्त' नामक राजा को मौर्यवंशीय चन्द्रगुप्त मौर्य से जोड़कर भारत के इतिहास को 1,300 वर्ष पीछे ढकेल दिया गया है । वास्तविकता यह है कि सिकन्दर का समकालीन चन्द्रगुप्त, गुप्तवंश से संबंध रखता था जो 327-320 ई॰पू॰ में हुआ।
तीसरा आधार है आद्य शंकराचार्य की तिथि । यह सर्वमान्य तथ्य है कि भगवान् बुद्ध और आद्य शंकराचार्य के मध्य लगभग 1,300 वर्षों का अन्तर था और बुद्ध, शंकराचार्य से पूर्ववर्ती थे । आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित 5 मठों, विशेषकर काँची-कामकोटि मठ, द्वारका शारदा मठ और पुरी गोवर्द्धन-मठ की आचार्य-परम्परा छठी शताब्दी ई॰पू॰ से प्रारम्भ होती है और स्वयं आद्य शंकराचार्य की तिथि भी 509-477 ई॰पू॰ प्रमाणित होती है । इससे 1,300 वर्ष पूर्व, अर्थात् 1887-1807 ई॰पू॰ में बुद्ध का काल निश्चित होता है ।
चौथा आधार बुद्ध की परम्परागत जन्म-कुण्डली है। बुद्ध की परम्परागत जन्म-कुण्डली में प्रदर्शित ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करने के उपरान्त गवर्नमेंट आर्ट्स कालेज़, राजमुन्द्रि (चेन्नई) के भूतपूर्व गणित-विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो. ह्वी. तिरुवेंकटाचार्य ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भगवान् बुद्ध का निर्वाण वैशाख शुक्ल पूर्णिमा, विशाखा नक्षत्र, तदनुसार 27 मार्च, 1807ई॰पू॰, मंगलवार की ब्राह्मवेला में हुआ था। उपर्युक्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए योजना के इतिहासकार श्रीराम श्रीपाद साठे ने 'डेट्स आफ द बुद्ध' नामक अपनी पुस्तक में बुद्ध की तिथि के विषय में प्रचलित भ्रांतियों का निराकरण किया है।


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