अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना
Akhil Bharatiya Itihas Sankalan Yojna

सेण्ड्रोकोट्टस बनाम चन्द्रगुप्त मौर्य


यह योजना का छठा प्रकल्प है। प्राचीन यूनानी-इतिहासकारों- डियोडोरस सिक्यूलस, मेस्ट्रीयस प्लूटार्क, स्ट्रैब्रो एवं एरियन; लैटिन-इतिहासकार जूनेनियस जस्टिनस एवं रोमन-इतिहासकार क्वांटियस कर्टियस र्यूफस तथा प्लिनी ज्येष्ठ की रचनाओं में सिकन्दर के आक्रमण के विषय में विविध उल्लेख मिलते हैं। इन लेखकों ने ईमानदारीपूर्वक यह स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने लेखन-कार्य के लिए यूनानी-इतिहासकार, भूगोलवेत्ता और पर्यटक मेगास्थनीज, जो यूनानी-शासक सेल्यूकस निकेटर का राजदूत बनकर भारतवर्ष आया था और जो पाँच वर्ष तक भारतीय-सम्राट् 'सेण्ड्रोकोट्टस' के राजदरबार में उनकी राजधानी 'पालीबोथ्रा' में रहा था, की तत्कालीन भारत पर लिखी 'इण्डिका' नामक पुस्तक का उपयोग किया है।

इण्डिका' तो दुर्भाग्यवश कहीं मिलती नहीं, किन्तु उसके बिखरे हुए अंश उक्त लेखकों की रचनाओं में ही पाए जाते हैं। उक्त एरियन आदि लेखकों नें मेगास्थनीज की 'इण्डिका' के आधार पर सिकन्दर के समकालीन मगध के 3 शासकों का उल्लेख क्रमशः 'जेन्ड्रमस' अथवा 'एग्रमस', 'सेण्ड्रोकोट्टस' अथवा 'एण्ड्रोकोट्टस' और 'सेण्ड्रोकप्टस'के रूप में किया है। किन्तु इन लेखकों ने यह नहीं बताया कि सिकन्दर के समकालीन मगध के ये 3 शासक किस वंश के थे। किन्तु पाश्चात्य इतिहासकारों ने बिना कुछ सोचे-विचारे यह निष्कर्ष निकाल लिया कि उपर्युक्त नाम क्रमशः नन्दवंशीय महापद्मनन्द, मौर्यवंशीय चन्द्रगुप्त मौर्य और समुद्रगुप्त के लिए ही प्रयुक्त हैं। दिनांक 28 फरवरी, 1793 ई॰ को कलकत्ता की एशियाटिक सोसाइटी के एक सम्मेलन में उसके संस्थापक सर विलियम जोन्स ने सगर्व यह घोषणा कर डाली की 'उसने चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में सेण्ड्रोकोट्टस को पाकर भारत के इतिहास की सबसे बड़ी, सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे कठिन समस्या का निदान पा लिया है'।
विलियम जोन्स के इसी वक्तव्य का आधार बनाकर और भारतीय-इतिहास-लेखन के लिए विदेशी-स्रोतों को आधार बनानेवाले तथा विशुद्ध यूनानी-स्रोतों के आधार पर चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन-चरित्र लिखनेवाले इतिहासकार डा॰ राधाकुमुद मुखर्जी ने भारतीय-इतिहास की इस सबसे बड़ी खोज के लिए विलियम जोन्स का आभार व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि इस खोज के फलस्वरूप चन्द्रगुप्त मौर्य तथा उसके शासनकाल के बारे में प्रचुर प्रमाण मिल गए हैं जो भारत में सिकन्दर के विजय-अभियानों का इतिहास लिखनेवालों ने अपनी रचनाओं में दिए हैं।'इसके आगे उन्होंने यह भी कहा कि चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक 320 ई॰पू॰ में हुआ था। उन्होंने यह भी घोषणा कर दी कि 'भारतीय-इतिहास उस बात के लिए भी इन्हीं (यूनानी) स्रोतों का आभारी है, जिसे उसके कालक्रम का मूल आधार कहा गया है, क्योंकि भारतीय-कालक्रम चन्द्रगुप्त मौर्य के सार्वभौम सत्ता-धारण करने की तिथि से आरम्भ होता है।
वस्तुतः चन्द्रगुप्त मौर्य और समकालिकता का सुझाव सर्वप्रथम विलियम जोन्स ने इसलिए दिया था क्योंकि उसे विशाखदत्त-रचित 'मुद्राराक्षस'नाटक में वर्णित चन्द्रगुप्त मौर्य के अतिरिक्त किसी अन्य चन्द्रगुप्त का ज्ञान ही न था। अन्ततोगत्वा जर्मन-प्राच्यविद् फ्रेडरिक मैक्समूलर को यह स्वीकार करना पड़ा कि यह कथित समकालिकता भारतीय, चीनी तथा अन्य प्रमाणों के प्रतिकूल पड़ती है, किन्तु भारतीय-इतिहास, यूरोपीय-इतिहास के अन्य किसी भी उपाय या समता से मेल नहीं खाता। अतः इस समकालिकता को अवश्य ही निर्णीत और अन्तिम मानना होगा, भले ही इस मानने में कठिनाइयाँ हों।
पौराणिक वंशावलियाँ एवं कालगणना के अनुसार मौर्य-वंश ने 1534-1218 ई॰पू॰ तक मगध पर शासन किया था। 1218 ई॰पू॰ में मौर्य-वंश के 12वें राजा बृहद्रथ को उसके सेनापति पुष्यमित्र ने मारकर राज्य हस्तगत किया और शुंग-वंश की नींव डाली। इस वंश में 10 राजा हुए जिन्होंने 300 वर्ष तक राज्य किया। 918 ई॰पू॰ में शुंग-वंश के राजा देवभूति को कण्ववंशीय वसुदेव नामक उनके मंत्री ने मारकर राज्य पर अधिकार कर लिया। इस वंश में 4 राजा हुए, जिन्होंने 85 वर्षों तक राज्य किया। 833 ई॰पू॰ में कण्ववंशीय सुशर्मा को मारकर आन्ध्रवंशीय श्रीमुख मगध का गद्दी पर बैठा। इस वंष में 33 राजा हुए, जिन्होंने 506 वर्षों तक (833-327 ई॰पू॰) शासन किया।
जिस समय सिकन्दर का आक्रमण होने को था, उस समय मगध की गद्दी पर आन्ध्र-वंश के 32वें राजा चन्द्रश्री शातकर्णी विराजमान थे। इन्हीं चन्द्रश्री को यूनानी-इतिहासकारों ने 'जेण्ड्रमस' के नाम से अभिहित किया है। चन्द्रगुप्त इन्हीं चन्द्रश्री शातकर्णी का मंत्री एवं सेनापति था। चन्द्रश्री के बाद पुलोमन तृतीय अल्पवयस्क अवस्था में ही आन्ध्र-वंश का राजा बना, तब चन्द्रगुप्त ने रानी की सहायता से अपने को राजा का संरक्षक बना लिया और 327 ई॰पू॰ में पुलोमन तृतीय को समाप्तकर स्वयं राजा बन बैठा। आन्ध्र-वंश का सेनापति होने के कारण यह नया वंश 'आन्ध्रभृत्य' कहलाया, किन्तु चन्द्रगुप्त ने अपने को गुप्तवंश का संस्थापक बताकर 'विजयादित्य' की उपाधि धारण की। कुछ समय बाद चन्द्रगुप्त ने अपनी प्रथम पत्नी के पुत्र समुद्रगुप्त अशोकादित्य प्रियदर्शन को राज्य न देकर अपनी द्वितीय पत्नी के पुत्र को देना चाहा था। फलस्वरूप समुद्रगुप्त को अपने नाना नेपाल के लिच्छवी-नरेश से सहायता लेनी पड़ी थी। विद्रोह की इस स्थिति में ही सिकन्दर ने भारतवर्ष पर आक्रमण किया था और चन्द्रश्री, चन्द्रगुप्त विजयादित्य और समुद्रगुप्त अशोकादित्य ही यूनानियों के सामने क्रमशः 'जेण्ड्रमस' 'सेण्ड्रकोट्टस' और 'सेण्ड्रोकिप्टस' के रूप में उपस्थित हुए थे। ग़लती से (या जान-बूझकर) इन्हें क्रमशः महापद्मनन्द, चन्द्रगुप्त मौर्य और बिन्दुसार मान लेने से भारतीय-इतिहास स्वयमेव 1,200 वर्ष नीचे सरक आया।
इस प्रकार सिकन्दर के समकालीन मौर्य चन्द्रगुप्त को मान लेने की त्रुटि ने भारत के प्राचीन इतिहास में 12 शताब्दियों का अन्तर ला दिया है। सिकन्दर का आक्रमण 326 ई॰पू॰ में हुआ था और यह चन्द्रगुप्त गुप्तवंश का है जिसका संबंध 327-320 ई॰पू॰ से है। अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना ने उपर्युक्त विषय को देश-विदेश के विद्वानों के समक्ष चर्चा के लिए रखा है।

 

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