अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना
Akhil Bharatiya Itihas Sankalan Yojna

राष्ट्रीय अध्यक्ष


अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो॰ शिवाजी सिंह प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान् हैं। श्री शिवाजी सिंह का जन्म दिनांक 18 जुलाई, 1934 को गोरखपुर (उ॰प्र॰) में हुआ। सन् 1956 में इन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व-विभाग से स्नातकोत्तर (प्रथम श्रेणी) की उपाधि प्राप्त की, तत्पश्चात् सन् 1965 में प्रो॰ सी॰डी॰ चटर्जी के निर्देशन में 'डायन आफ़ बुद्धिस्ट स्कालरशिप एण्ड अशोकन स्टडीज़'विषय पर पीएच॰ डी॰ की उपाधि प्राप्त की। जुलाई, 1956 में आपने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यापन-कार्य शुरू किया और बाद में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व-विभाग में प्राध्यापक हुए जहाँ से जून, 1965 में विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए। इस प्रकार लगभग 4 दशकों तक (1956-'95) विश्वविद्यालयों में अध्यापन-कार्य से सम्बद्ध रहे।

इस दौरान शोध-छात्रों की एक विशाल संख्या का शोध-निर्देशन किया।भारत एवं यूनान के बीच विद्वानों के आदान-प्रदान की व्यवस्था में प्रो॰ शिवाजी सिंह दो वर्ष (1969-'71) एथेंस में रहे। इस अवधि में उन्होंने 'ग्रीक गवर्नमेंट स्कालर इन आर्कियोलाज़ी' के रूप में कार्य किया। इसके साथ ही उन्होंने एथेंस विश्वविद्यालय में यूनानी-भाषा का अध्ययन किया, 'एथेंस सेन्टर आफ़ इकिस्टिक्स'के प्राचीन यूनानी-नगर-प्रकल्प में भाग लिया और नवप्रस्तरयुगीन यूनान पर एक ग्रन्थ की रचना की।
प्रो॰ शिवाजी सिंह ने पूर्वी उत्तरप्रदेश में पुरातात्त्विक अभियान का संचालन किया जिससे अनेक प्राचीन स्थलों का पता चला और बहुमूल्य पुरातात्त्विक सामग्री प्राप्त हुई। आपने मिस्र, यूनान, इटली, स्विट्जरलैण्ड, फ्रांस, इग्लैण्ड और अमेरिका के अनेक नगरों की शैक्षणिक यात्राएँ की हैं और वहाँ के पुरातात्त्विक स्थलों, संग्रहालयों और पुस्तकालयों का व्यापक निरीक्षण एवं उपयोग किया है। 'वैदिक साहित्य और भारतीय-पुरैतिहासिक पुरातत्त्व का समन्वय'- यह आपका प्रिय विषय रहा है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से अवकाश प्राप्त करने के पश्चात् आप निरन्तर इसी विषय पर शोध-कार्य कर रहे हैं। इन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के एक बृहत् शोध-प्रकल्प का संचालन किया है, जिसका शीर्षक है : 'वैदिक होराइजन इन आर्कियोलाज़ी' (दिसम्बर, 1999)।'भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, नयी दिल्ली के सीनियर फेलो के रूप में इन्होंने एक दूसरे शोध-प्रकल्प : 'ऋग्वैदिक एण्ड हड़प्पन एथ्नो-ज्योग्राफि़क कनफिगरेशन्स' (मार्च, 2002) को पूर्ण किया है। इन नवीन कार्यों से संबंधित आपका ग्रन्थ 'द ऋग्वेद : एन आर्कियोलाजि़कल पर्सपेक्टिव' सम्प्रति प्रकाशनाधीन है। अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं में शोध-पत्रों के प्रकाशन के अतिरिक्त आपके कई मौलिक ग्रन्थ भी प्रकाशित हैं। इनमें प्रमुख हैं-
1. 'Evolution of the Smr̥ti Law: A Study in the Factors Leading to the Origin and Development of Ancient Indian Legal Ideas' (1972)
2. 'द नियोलिथिक एज़ इन ग्रीस' (1972)
3. 'Models, Paradigms and the New Archaeology' (1985)
4. 'वैदिक कल्चर एण्ड इट्स कंटीन्यूटी : न्यू पैराडाइम एण्ड डायमेंशन्स' (2003)
5. 'ऋग्वैदिक आर्य एवं सरस्वती-सिंधु सभ्यता' (2004)
प्रो॰ शिवाजी सिंह ने देश एवं विदेशों में आयोजित अनेक विद्वत् सम्मेलनों एवं गोष्ठियों की अध्यक्षता की है। सन् 2004 में उन्हें योजना का प्रतिष्ठित 'डा॰ विष्णु श्रीधर वाकणकर राष्ट्रीय पुरस्कार' देकर सम्मानित किया गया है।



प्रो. शिवाजी सिंह
शिवाला नगर, मोहद्दीपुर,
गोरखपुर-273 008 (उ.प्र.)
दूर.: 00551-2200747,; मो.: 09628872796
ई-मेल : prof_sivaji@yahoo.com

 

 

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