अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना
Akhil Bharatiya Itihas Sankalan Yojna

योजना का उद्देश्य


अनेक क्षेत्र में अनुभव किया जाता रहा है कि भारतीय-इतिहास-लेखन का जो कार्य अंग्रजों के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ और वैज्ञानिक, वस्तुपरक शोध के नाम पर जिसे भारतीय-इतिहासकारों ने भी अपनाया, वह अनेक स्थलों पर पूर्वाग्रह से प्रेरित, तथ्यों के अज्ञान अथवा जान-बूझकर की गई उपेक्षा पर आधारित है जिसके कारण भारतीय-इतिहास में अनेक विसंगतियाँ एवं भ्रम उत्पन्न हो गए हैं। आर्य-द्रविड़ समस्या इसका एक ज्वलन्त उदाहरण है जिसे सुनियोजित तरीके से स्थापित किया गया था तथा इसपर इतनी चर्चा चलाई गई कि भारतीय-वाङ्मय के उद्भट विद्वान् भी इसे सत्य मानकर चलने लगे। इतिहास-लेखन में भारतीय-स्रोतों की अवहेलनाकर उसे तिरस्कृत किया गया। विदेशी-आक्रमण के युगों को उभारा गया। अन्धकार-युग की कल्पना, मुस्लिम-इतिहाकारों के दुराग्रह एवं दम्भपूर्ण उल्लेखों को ऐतिहासिक तथ्य की मान्यता, भारतीय-परम्पराओं एवं साहित्यिक स्रोतों की उपेक्षा आदि से भारत का इतिहास विकृत हुआ है। इतिहासकार के मन में किसी सर्वमान्य राष्ट्रीय आदर्श के आभाव तथा विभिन्न राजनीतिक वादों के प्रभाव ने राष्ट्रीय स्तर पर उसे वैचारिक अस्पष्टता से ग्रस्त कर दिया है।

उपर्युक्त विचारों की पृष्ठभूमि में अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना का उद्देश्य है भारतीय-कालगणना के आधार पर सृष्टि-रचना के प्रारम्भ से लेकर वर्तमान समय तक के इतिहास का पुनर्संकलन। यह पुनर्संकलन सत्य, सही, निष्पक्ष तथ्यों पर आधारित, किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से रहित, आधुनिक वैज्ञानिक-अनुसंधानों और नवीनतम पुरातात्त्विक खोजों के आधार पर होगा। इस प्रकार हमारे देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा जीवन के अन्य सभी पक्षों को दर्शाते हुए हमारे देश का वास्तविक सूत्रबद्धात्मक तथा व्यापक इतिहास तैयार किया जायेगा। योजना का ध्येय-वाक्य है- ‘नामूलं लिख्यते किंचित्’।

योजना के उद्देश्य के प्रमुख बिन्दु निम्नवत् हैं-

1. भारतीय-इतिहास में विद्यमान विकृतियों को दूर करना ।

2. जिन विकृतियों के आधार पर भारतीय-इतिहास की रचना की गई है, उन विकृतियों का खण्डन करके इतिहास की पुनर्रचना ।

3. इस प्रकार की पुनर्रचना के लिए प्राच्यविद्या की विभिन्न विधाओं से संबंधित प्रकाशित-अप्रकाशित प्रामाणिक सामग्री का जि़ला तथा ग्राम-स्तर पर संकलन।

4. महाभारत-काल से लेकर वर्तमान तक और भारतीय-कालगणना के आधार पर जिला-सह भारतीय-दृष्टिकोण से और भारतीय&कालगणना के आधार पर इतिहास-लेखन की व्यवस्था करना।

5. एतदर्थ योग्य व्यक्तियों, संस्थाओं तथा संगठनों आदि से सम्पर्क स्थापित करते हुए उन्हें संगठित एवं प्रेरित करना।

6. भारतीय-संस्कृति, प्राच्यविद्या एवं पूर्वजों की विशिष्ट उपलब्धियों के प्रति सामान्य व्यक्ति के हृदय में आदर-अनुराग, अभिरुचि एवं चेतना उत्पन्न करने के लिए कार्यक्रम आयोजित करना।

7. भारतीय-इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व से संबंधित अनुसंधानों को प्रोत्साहित करने के लिए संगोष्ठियों, परिचर्चाओं एवं विशेष व्याख्यानों आदि का आयोजन करना।


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