अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना
Akhil Bharatiya Itihas Sankalan Yojna

योजना का प्रतीक-चिह्न


इतिहास का महत्त्व
‘ इतिहास-पुरुष ’ का चित्रांकन भारतीय-इतिहास-विषयक अवधारणा के स्पष्ट करता है। भारतीय-मनीषा इतिहास के महत्त्व को कितना स्वीकार करती थी, इसका परिचायक है यह ‘इतिहास-पुरुष’। महाभारतकार ने इतिहास के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है -

‘वृत्तं यत्नेन संरक्षेत वृत्तमायाति याति च। अक्षीणो वृत्ततः क्षीणः वृत्त स्तु हतः ।।’

अर्थात् इतिहास (वृत्त) की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। ‘वृत्त’तो आता-जाता रहता है। वित्त के नष्ट होने से कोई नष्ट नही होता, किंतु वृत्त (इतिहास) के नष्ट होने से व्यक्ति/जाति/समाज/किंवा राष्ट्र नष्ट हो जाता है।

इतिहास का स्वरूप- इतिहास के स्वरूप एवं प्रारम्भ पर प्रकाश डालते हुए ‘श्रीतत्त्वनिधि’में लिखा है-
‘इतिहास कुशाभासः सूकरास्यो महोदरः। अक्षसूत्रं घटं विभ्रत्पंकजाभरणान्वित:।।’
सृष्टि-संवत् का प्रारंभ श्वेतवाराह कल्प से होता है, अतः ‘इतिहास-पुरुष’वराहमुख है। काल का विशाल स्वरूप इतिहास के उदर में समाहित है, अतः वह (इतिहास) महोदर (अर्थात विशाल उदरवाला) कहा गया है। पार्थिव इतिहास का रंग-रूप पृथिवी के रंग-रूप से बनता है, अतः उसे कुशाभास (कुशाओं-जैसा आभासित होनेवाला) कहा गया है। इतिहास, काल के संख्यात्मक निर्देश से सूत्रित है, अतः इतिहास-पुरुष अक्षसूत्र धारण किए है। ज्ञानामृत का दान उसका पावन उद्देश्य है, अतः उसके दूसरे हाथ में अमृत-घट विद्यमान है। इतिहास-पुरुष का यह शरीर कमलाभूषणों से विभूषित है। कमल स्वयं सौन्दर्य, विकास और आनन्द का प्रतीक है।

यहाँ पर यह बता देना भी अनावश्यक न होगा कि भारतीय-परम्परा ने विश्व के ऐतिहासिक अतीत की पहचान अनेक प्रकार से प्राप्त की है। उसके प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न अनेक मनोवैज्ञानिक प्रकार हैं, उसके भौतिक और आध्यात्मिक अनेक आधार हैं जो धर्म, दर्शन और विज्ञान के तत्त्व-चिन्तन पर प्रतिष्ठित हैं। इसके विपरीत पश्चिम की परम्परा का अतीत-चिन्तन और इतिहास-चिन्तन कब्रों से जुड़ा है। ममी, पिरामिड, प्रतिमाएँ, संग्रहालय, भग्नावशेष आदि इसी मृतक-प्रतीकवाद के परिपोषक हैं। मृतकों के प्रतीकवाद के पास भविष्य-दर्शन की कोई विद्या व रूपरेखा नही है। मानवीय हड्डियों से प्राप्त होनेवाले टुकड़े अतीत को वर्तमान से जोड़ने की कड़ी का काम नहीं कर सकते। यही कारण है कि जहाँ तक मानवी हड्डियों के टुकड़े मिलते हैं, वहाँ उनके वैज्ञानिक-चिन्तन की सीमा स्थिर हो जाती है। पुनः नये टुकड़े प्राप्त होने पर पुनः बदल जाती है। अतः वर्तमान को अतीत के साथ जोड़ना सम्भव नहीं है। भौतिक नृतत्त्व शास्त्र का अभी तक यही इतिहास रहा है।

दूसरी तरफ़ भारतीय-संस्कृति में इतिहास के तत्त्व-चिन्तन की सीमा अपने वर्तमान के लिए अतीत की स्मृति के रूप में रही है। कहना न होगा कि पश्चिम में ‘अतीत का वर्तमान से क्या संबंध है’- इस दृष्टि का समुचित सूत्रपात यूरोपीय-विद्यापीठों में भारतीय-विद्याओं के प्रवेश एवं उनके तुलनात्मक अध्ययन के बाद प्रारम्भ हुआ।

इतिहास का उद्देश्य- पश्चिम आज भी इतिहास की उपयोगिता एवं उद्देश्य से अनभिज्ञ है। दूसरी तरफ भागवतमहापुराण (12.3.14) में भगवत्पाद श्रीशुकदेवजी, परीक्षित को स्वायम्भुव मन्वन्तर से लेकर तब तक का 1.95 अरब वर्षों का इतिहास वर्णित करने का उद्देश्य इन शब्दों में स्पष्ट करते हैं-


‘कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम्। विज्ञानवैराग्यविवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमाथ्र्यम्।।’
अर्थात् ‘हे परीक्षित! इस लोक में अनेक बड़े-बड़े महापुरुष हो चुके हैं जो इस पृथिवी पर अपने तेज और यश का विस्तार करके चले गये। उनकी ये इतिहास-कथाएँ तुम्हें विज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति के लिए कही गई हैं। इन्हे तुम वाणी का वैभव और विलासमात्र न समझो, इनमें जीवन का परम अर्थ और तत्त्व समाहित है।’ इस प्रकार ‘इतिहास-पुरुष’की अवधारणा एवं उसके प्रतीकात्मक चित्रांकन (शरीर) के निर्माण से भारतीय-इतिहासशास्त्र के चरम मर्म का उद्घाटन होता है।

 


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